"जब समय की रफ्तार ने रिश्तों की गर्माहट को छीन लिया है, और मनुष्य डिजिटल निकटताओं में उलझकर भावनात्मक दूरियों का शिकार हो गया है—तब एक स्त्री-चिंतक के नाते मेरा स्वर यह है कि समाज को फिर से उन सूक्ष्म स्पंदनों से जोड़ा जाए, जहाँ आँखें संवाद करें, मौन में भी अपनापन हो, और साथ केवल स्क्रीन की रोशनी नहीं, आत्माओं की जुड़ाव में महसूस हो।"